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Showing posts from August, 2020

Qeemat Azadi ki

         क़ीमत आज़ादी की लखनऊ 1942 (कालेज के सालाना जलसे से अपनी बग्घी में लौटते हुए। मिर्ज़ा सरफराज़ रिज़वी और उनके दोस्त महेश शंकर विद्यार्थी ) सरफराज़ रिज़वी - ये लखनऊ की हसीन सरजमीं वल्लाह...     ये गोमती का किनारा...     वाह है ! जन्नत का नज़ारा... महेश -  सही कहा, तुम्हारा इश्क़ देख कर तो मैं भी हैरत में पड़ जाता हूं। इंटरमीडिएट की डिग्री तो मिल  गई आगे क्या इरादा है ? सरफराज़ रिज़वी -  अब्बू साहब वकालत पढ़ने के लिए बाहर भेजने की ज़िद पकड़ कर बैठे हैं। महेश -   अच्छा...  हां...तुमने जो आज़ादी के लिए "अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का "लेख कालेज की मैगज़ीन के लिए लिखा था। उसकी तो बहुत वाह वाही हो रही है। लो नवाब साहब तुम्हारी तो कोठी आ गई। सरफराज़ -   आह.....छोड़ो भी कहां की नवाबी ? मिर्ज़ा सआदत रिज़वी की कोठी खंडहर बता रहे हैं कि .... इमारत बुलंद थी... गोमती नदी के ठीक किनारे पर आगे पीछे शानदार बागों के साथ एक वक्त में नवाब वाजिद अली शाह ने बड़े शौक़ से अपनी बेटी ज़ेबुन्निसा के लिए बनवाई थ...

Paralysis

                           पैरालिसिस कहीं ईमान बिक जाते हैं,कहीं फरमान बिक जाते हैं        लगा के देखो तो बोली यहाँ इंसान बिक जाते है । " अब कोई खतरे की बात नहीं , she is fine " डॉ की धीमी आती आवाज़ पे कोमल ने तेज़ दर्द से चुभती आँखों को खोलने की कोशिश की ,पास बैठी माँ उसके ठंडे पड़ते माथे पे हाथ रख कर हौले से सहलाते हुए बोली , " तुम अच्छी हो गई मेरी बच्ची हम घर चलेंगे "। घर .... हाँ घर ...... में तो पापा ....... वो सफ़ेद कफन मे लिपटे मेरे पापा....उनके पास तो वही खड़ा था उनका बॉस मुकेश | " माँ वो मुकेश क्यूँ आया था ? बताओ वो पापा से क्यूँ मिलने...." आह ! मेरी आंखे  रही हैं " कोमल की गुस्से से तेज़ होती आवाज़ धीमी पड़ गई | माँ , " तुम सो जाओ बेटा ,आज तीन दिन के बाद होश आया है छुट्टी मिलने वाली है हॉस्पिटल से हम घर चल के बात करेंगे " सोते ही कोमल के मानसपटल पे अपने चिंतित पिता का चित्र उभरने लगा .... ...........................