Qeemat Azadi ki
क़ीमत आज़ादी की लखनऊ 1942 (कालेज के सालाना जलसे से अपनी बग्घी में लौटते हुए। मिर्ज़ा सरफराज़ रिज़वी और उनके दोस्त महेश शंकर विद्यार्थी ) सरफराज़ रिज़वी - ये लखनऊ की हसीन सरजमीं वल्लाह... ये गोमती का किनारा... वाह है ! जन्नत का नज़ारा... महेश - सही कहा, तुम्हारा इश्क़ देख कर तो मैं भी हैरत में पड़ जाता हूं। इंटरमीडिएट की डिग्री तो मिल गई आगे क्या इरादा है ? सरफराज़ रिज़वी - अब्बू साहब वकालत पढ़ने के लिए बाहर भेजने की ज़िद पकड़ कर बैठे हैं। महेश - अच्छा... हां...तुमने जो आज़ादी के लिए "अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का "लेख कालेज की मैगज़ीन के लिए लिखा था। उसकी तो बहुत वाह वाही हो रही है। लो नवाब साहब तुम्हारी तो कोठी आ गई। सरफराज़ - आह.....छोड़ो भी कहां की नवाबी ? मिर्ज़ा सआदत रिज़वी की कोठी खंडहर बता रहे हैं कि .... इमारत बुलंद थी... गोमती नदी के ठीक किनारे पर आगे पीछे शानदार बागों के साथ एक वक्त में नवाब वाजिद अली शाह ने बड़े शौक़ से अपनी बेटी ज़ेबुन्निसा के लिए बनवाई थ...