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Showing posts from 2020

Dr. Dave

दिल के नहीं मगर दिल से सच्चे डॉक्टर की कहानी।                              डॉक्टर दवे एक छोटे से शहर में थोड़ी पुरानी बिल्डिंग में था अमेरिका में पढ़ कर काफी जीवन बिताकर लौटे अधेड़ उम्र के मालिक डॉक्टर  दवे का क्लीनिक। शहर में बच्चों के ख़ास और अच्छे डॉक्टर होने के साथ-साथ कई दूसरी विशेषता भी थी जिसके लिए वह जाने जाते थे। इन्हीं से अब वास्ता पढ़ने वाला था राकेश और उजाला दंपति का जो अपने 5 वर्ष के बेटे कृष के बार बार बीमार पड़ जाने को लेकर परेशान थे। क्लीनिक के बाहर टंगा बोर्ड :               सुबह का समय- 6:00 बजे से केवल 5 लोग               शाम का समय - 4:00 बजे से केवल 5 लोग               इमरजेंसी के  समय परेशान ना करें कहीं      ...

Mera pahla pyar

                       मेरा पहला प्यार  हिन्दी मेरी मुहब्बत है , फ़ख़्र  है , एतमाद है।  एक हिंदुस्तानी होने के नाते जन्म लेने के बाद जो पहला बोल  मेरे मुंह से फूटा होगा उसमें शक नहीं कि वह हिन्दी का ना हो। हिंदी हमारी मातृभाषा है ।                 मात्र एक भाषा नहीं है। 50 करोड़ के आसपास लोग हिन्दी भाषा को बोलते हैं। यह हमारी राष्ट्रभाषा है। मगर ऐसा नहीं कि पूरे भारत में यह बोली जाती है। बल्कि भाषा के संबंध में तो कहावत है कि- भारत में  " कोस कोस पर पानी बदले , चार कोस पर बानी " इतने बड़े भूभाग के हम स्वामी है। सब भारतवासियों की अलग अलग अंचल की अपनी भाषा है , घर की , प्यार की सब अलग है ।हम उत्तरी भारत के हैं तो हमारा रिश्ता अधिक गहरा है। कल हिन्दी दिवस था मेरी बहन ने मुझसे सवाल किया , अरे हिन्दी से दोस्ती ! ( प्यार से मुझे बुलाती है) आपने कुछ लिखा नहीं। मैंने कहा हां.... क्योंकि मैं पढ़ने में व्यस्त थी । पढ़ना मस्तिष्क का आहार है। पढ़ना लिखना जीवन है। सांस लेना (...

Tareef : karke dekhie

       तारीफ : करके देखिए  हाँ ! अच्छा लगता है | सच में | तारीफ का अपना एक गणित है , एक विज्ञान है , मनोविज्ञान भी है | सामाजिक पहचान है और तो और लंबा इतिहास है | पता है तारीफ करना एक कला है | सारे विषय से तो रिश्ता जोड़ दिया मैंने मगर कम्प्युटर विषय से क्या ताल्लुक है नहीं जानते हां दिन रात कंप्यूटर पे व्यतीत करने वालों से रिश्ता गहरा है | जाएका -ए -तारीफ बड़ा खुशनुमा है ।सबको अपनी तारीफ बड़ी भाती है - " शायर को खुश करती है तारीफ ए शेर , सौ बोतलों का नशा है इस वाह वाह में "  मगर  बात जब दूसरों की तारीफ की आती है तो रुपये मे बारह आने लोग भांजी मार जाते है | क्योंकि उनकी psychology कुछ इस प्रकार की है -   "इतनी तारीफ न किया करो रूह कंपकपा जाती है मियां | सुना है जो अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं अच्छे वही होते हैं " वास्तव मे आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जी के अनुसार समाज मे निंदा , ईर्ष्या के ही भाव प्रचलित हैं |मानव मन मस्तिष्क के चारों कोनो मे जंगली झाड़ियों की तरह यही पनपती फलती फूलती हैं | कुछ तकिया कलाम भी उर्फ ए आम हैं जैसे - ज़्यादा तारीफ ...

Qeemat Azadi ki

         क़ीमत आज़ादी की लखनऊ 1942 (कालेज के सालाना जलसे से अपनी बग्घी में लौटते हुए। मिर्ज़ा सरफराज़ रिज़वी और उनके दोस्त महेश शंकर विद्यार्थी ) सरफराज़ रिज़वी - ये लखनऊ की हसीन सरजमीं वल्लाह...     ये गोमती का किनारा...     वाह है ! जन्नत का नज़ारा... महेश -  सही कहा, तुम्हारा इश्क़ देख कर तो मैं भी हैरत में पड़ जाता हूं। इंटरमीडिएट की डिग्री तो मिल  गई आगे क्या इरादा है ? सरफराज़ रिज़वी -  अब्बू साहब वकालत पढ़ने के लिए बाहर भेजने की ज़िद पकड़ कर बैठे हैं। महेश -   अच्छा...  हां...तुमने जो आज़ादी के लिए "अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का "लेख कालेज की मैगज़ीन के लिए लिखा था। उसकी तो बहुत वाह वाही हो रही है। लो नवाब साहब तुम्हारी तो कोठी आ गई। सरफराज़ -   आह.....छोड़ो भी कहां की नवाबी ? मिर्ज़ा सआदत रिज़वी की कोठी खंडहर बता रहे हैं कि .... इमारत बुलंद थी... गोमती नदी के ठीक किनारे पर आगे पीछे शानदार बागों के साथ एक वक्त में नवाब वाजिद अली शाह ने बड़े शौक़ से अपनी बेटी ज़ेबुन्निसा के लिए बनवाई थ...

Paralysis

                           पैरालिसिस कहीं ईमान बिक जाते हैं,कहीं फरमान बिक जाते हैं        लगा के देखो तो बोली यहाँ इंसान बिक जाते है । " अब कोई खतरे की बात नहीं , she is fine " डॉ की धीमी आती आवाज़ पे कोमल ने तेज़ दर्द से चुभती आँखों को खोलने की कोशिश की ,पास बैठी माँ उसके ठंडे पड़ते माथे पे हाथ रख कर हौले से सहलाते हुए बोली , " तुम अच्छी हो गई मेरी बच्ची हम घर चलेंगे "। घर .... हाँ घर ...... में तो पापा ....... वो सफ़ेद कफन मे लिपटे मेरे पापा....उनके पास तो वही खड़ा था उनका बॉस मुकेश | " माँ वो मुकेश क्यूँ आया था ? बताओ वो पापा से क्यूँ मिलने...." आह ! मेरी आंखे  रही हैं " कोमल की गुस्से से तेज़ होती आवाज़ धीमी पड़ गई | माँ , " तुम सो जाओ बेटा ,आज तीन दिन के बाद होश आया है छुट्टी मिलने वाली है हॉस्पिटल से हम घर चल के बात करेंगे " सोते ही कोमल के मानसपटल पे अपने चिंतित पिता का चित्र उभरने लगा .... ...........................

I can't breathe

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I can't breathe  😭 प्रस्तुत टर्म की शुरुआत अमेरिका के हाल ही मे हुए अश्वेत आंदोलन से हुई जब एक श्वेत पुलिस कर्मी ने अश्वेत जार्ज फ्लाएड नामी व्यक्ति का सिर अपने पैरों से कुचल दिया और वह अपनी जान की भीख मांगता रहा , " मैं सांस नहीं ले पा  रहा, प्लीज़ रहम करो !" बहुत ही निंदनीय घटना इस पे जितना रोष जताया जाए कम ही रहेगा|         अकसर जीवन में कुछ ऐसे पल आ ही जाते हैं| जो दम घोंटू होते हैं| खैर दम तो इस समय सबका घुंट रहा है, भूख से भी, सड़क पे भी ,घर बैठ के भी,किचन मे खाना बना के भी| और खास बात यह है कि आपदा को अवसर मे बदलने को भी तैयार बैठे हैं लोग यहाँ तो। इस कोरोना काल में कितनों का रोजगार छिन गया, तो कइयों का चमक भी गया| किसी का घर जले कोई तापे| करे भी क्यूँ ना, "सच्चा पूंजीपति होता भी वही है जो फांसी के समय भी आपको रस्सी बेच दे "|  गरीब भूख से बिलखते रहे, हम खाना बना बना के बर्तन माँजते रहे| दर्द स्त्रियों का भी कोई समझता नहीं, समझ से याद आया जो विश्व के सबसे समझदार देश ठहरे उन्होने भी क्या फोड़ लिया कोरोना केस भी वहाँ कम नहीं...

Noorjahan-Mumtaz

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नोट:- लफ्ज़ उलझे हुए, भावनाऐं बहकी हुई, ज़बान अजीब सी हैं। पढ़ के आखिर में आप ये बोलने को गर मजबूर हो गए। क्या बकवास है। तो लिखना सफल । 👍 नूरजहां – मुमताज़ (उर्दू kafka ) उफ़्फ़ अल्लाह , हाए मेरी तौबा ,मेरे परवरदिगार आपकी पनाह चाहती हूँ | ये गुलाबो - सिताबों की जोड़ी अम्मी  की खालाएँ , अब्बू की फुफ्फियां , सारे जहां की हमदर्द , सबकी खासमखास रिश्तेदार अपनी दिल अज़ीज़ नातिन के साथ घर में तशरीफ आवरी फरमां चुकी हैं |अब मैं चली ये खुशख़बरी का बम अपिया ज़ूबी के सर पे दाग़ने , यकीनन वो आतिश-फ़िशां की तरह फट पड़ेंगी | ना जाने कितनी देर- कितनी ही देर में वो अपने खिसियाए हुए चेहरे का जुगराफिया सुधार पाएँगी | आज ज़रा उन्होने अपनी दुनिया में आमद- ए- नागेहानी की बर्थड़े पार्टी क्या रख ली तो इस खबर-ए-अव्वल को न जाने किस नासपिटे, मरगिल्ले एक पर वाले काले कबूतर ने इन्हें दे दी |              वैसे तो किसी भी शादी ब्याह, मेहंदी, उबटन,ईद,बकरीद, जलसा, फातिहा, चालीसवाँ में इनका आना, जी भर के खाना, हर काम में बढ़-चढ़ के शामिल रहना अव...

Aatmnirbharta ka sukh

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             आत्मनिर्भरता का सुख यह है बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर |एक 13 वर्ष की बच्ची साथ मे है उसका 8 वर्ष का भाई सब्जी बेचते हुए | lockdown मे पिता का मजदूरी व्यवसाय समाप्त हो जाने पे इन्हे इस कार्य पे लगा दिया बाल मजदूरी अधिनियम 1986 का पुरजोर खंडन करते हुए  कि ये गली गली मे सब्जी बेच लेंगे और पुलिस इनको रोकेगी भी नहीं| हर रोज़ ही इस जहां से हिसाब मांगते हैं  मन ही मन ये बच्चे किताब मांगते हैं | इसी लिए ये कहा जाता है  कि बच्चे मासूम होते हैं इन्हे कुछ पता भी नहीं कि क्या कुछ ये खो रहे हैं या कितना जोखिम ये उठा रहे हैं | बल्कि पूरे lockdown के समय ये मुझे हंसी खुशी सब्जी बेचते नज़र आए | मैं कोई रिपोर्टर तो नहीं फोटो तो ले ली इनसे हंसते बोलते मगर मानवता के नाते  चेहरा blur कर दिया है |वैसे भी ये कोई अनोखी तस्वीर तो है  नहीं यदि आप नज़र दौड़ाएँ हर सड़क के चौराहे , नुक्कड़  पे बड़ी आसानी से ये नज़ारा देखने को मिल जाएगा |तो मुद्दा ये है कि बच्चो से मैंने पूछा तुम थकते नहीं सामने से खुशी खुशी  उसका उत्तर था " नहीं , मुझे तो रो...

Chhadm vastvikta ke shikhar par hum

छद्म वास्तविकता के शिखर पर हम  मनुष्य का ये जन्म जात गुण है कि उसे अच्छा तभी लगता है जब सब कुछ अच्छा हो | कहने का तात्पर्य ये है  कि अपने समक्ष अप्रिय स्थिति पा के हम घबरा जाते हैं उदास हो जाते हैं उसे देखना सुनना नहीं चाहते , कठिनाइयों से दूर भाग जाना चाहते हैं । मुझे नहीं लगता इसमे कोई बुराई की बात है ऐसा तो सबके साथ होता है , समस्या तो तब प्रारम्भ होती है जब हम सत्य का सामना ही ना कर पाएँ और परेशानियों का हल ढूँढने के बजाए , स्वयं मे कोई परिवर्तन की ज़रूरत महसूस किए बिना स्वयं की एक ऐसी धरा का निर्माण कर ले जिसमे "मैं ही  सिर्फ सही "| सोच कर  आनंद पूर्वक रहें | हमारे समाज की यही दशा हो चुकी है हम यही सोच रहे हैं कि - सिर्फ मैं ही समझदार बाक़ी सब नादान | इसी भ्रम मे आज कल घूम रहा इंसान | वर्षों की कठिन तपस्या और अनगिनत लोगों के बलिदानो से प्राप्त आज़ादी आज कोई कीमत नहीं रखती हमारे सपनों का भारत और समाज विनाश के कगार पे है तो हम केवल अपने अहं के गुलाम बनकर समस्याओं का दोष दूसरों के व्यक्तित्व पे सजा के आराम से अपने मन मस्तिष्क के बने सुंदर संसार मे रह रहे हैं |स्वयं मे...

Vo kyun hansti hai ?

        वो क्यूँ हंसती‌‌ है ? ☺ नील नभ पे बियाबान मे, है भटक रही  क्यूँ  एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी ?   ओफ़्फ़ अभी किचन से कमरे मे आई ही थी की बाहर बेल बज गई यहाँ कौन  हमे जानता ही है जो इस समय आ गया ? दरअसल हम ठहरे बैंकर परिवार  हर तीन साल मे होने वाले तबादलों के मारे एक सप्ताह भी नहीं हुआ था अमरेली से भावनगर आए हुए |शुक्र है पैकर मूवर्स का जो समान रखने उठाने की बचत हो जाती है |फिर भी चार दिनो  से मैं घर ही सेट करने मे ही  मसरूफ़ हूँ | खैर दरवाजा खोला तो सामने एक अधेड़ उम्र की, मझोले कद काठी एवं साँवले रंग आम से नक्श-ए-निगार की महिला खड़ी मुस्कुरा रही थी| जिस चीज़ ने मुझे आकर्षित किया वो थी उसकी हंसी| मुझे जानती नहीं फिर भी हसने की हद तक मुस्कुरा रही थी |साथ मे थीं मेरी नई पड़ोसन  |मुझे देखते ही तपाक से बोली "आपने घर काम के लिए बोला था ना ये है मासी ,अच्छा काम करती हैं |ख़ास बात ये है की छुट्टी भी नहीं करती | नाम है महफूज़ा बेन"| मन ही मन मैं अपनी भली पड़ोसन की एहसान मंद हो गई मैंने उत्सुकता वश पूछा, "छुट्टी क्यूँ नहीं करती"?  उनके...

Celebration

आप सभी का हार्दिक आभार  मेरे ब्लॉग पे आप आए और आते रहे ,आते जाते कब ये गिनती 1000 को पर कर गई पता ही नहीं चला।आप सभी का  सहयोग मेरे लिए बहुत मह्वपूर्ण है। पहली विडियो ज़्यादा साफ नहीं थी तो इसमें देखिए आप सबका प्यार मेरे लिए ।कैसे समय समय पे आप सभी में मेरा हौसला बढ़ाया। मैं शुक्र गुज़ार हूं उपर वाले की जिसने आप से मित्र जीवन में दिए।

Aaj inpe guzri kal hampe na guzre

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          आज इनपे गुज़री कल हमपे न गुज़रे| ये आँख चुराने का समय नहीं | आज से चार वर्ष पहले मैंने " तर्क संगत नहीं आत्महत्या पे मौन " नामी शीर्षक से ये लेख लिखा था बैंक की e-magazine भावभूमि  मे छपने दिया था| और अब दुबारा इसकी ज़रूरत पड़ गई ऐसा मेरा विचार है | शुरुआत यहाँ से हुई- वर्ष 2016 television ऑन करते ही समाचार उद्घोषिका की आवाज़ से मैं एक क्षण को स्तब्ध रह गई , "जानी मानी  Tv कलाकार प्रत्यूशा बनर्जी ने आत्महत्या कर ली "| इस बात की तह मे ना जाते हुए  ये हत्या है या आत्महत्या,मेरे मन मे दुख की एक लहर उठ गई |ये क्या हो गया है हमारे आज के समाज को ,चारों तरफ बार बार आत्महत्या  की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही उठने लगी है | फिर खयाल आया कि  जीवित रहना और जीवन के लिए संघर्ष करना क्या अब कुछ ज़्यादा ही कठिन हो गया है |एक शायर के अनुसार  "ख़ुदकुशी के लिए थोड़ा सा ये काफी है मगर, ज़िंदा रहने के लिए बहुत जहर पिया जाता है|" सब कुछ सुन जान के भी हम चुप रह जाते हैं इसके बारे मे ज़्यादा बात नहीं करते हमे लगता है ये कुकृत्य अक्षम्य अपराध है |ये व्यक्ति स्वयं का...

Pravas hi niyati thahra

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प्रवास ही नियति  ठहरा!   वर्तमान कोरोनाकाल में मई माह में जो प्रवासी मजदूर सड़क पर चल रहे,रेल पटरियों पर कट रहे, सड़क दुघर्टना में मर रहे उनकी दुर्दशा और दुख का अंदाजा मात्र भी हम नहीं लगा सकते अपने फुल ऐसी के कमरे में बैठ मनपसंद इंग्लिश फिल्म के साथ घर में बने पिज्जा बर्गर खाते समय।  जिस प्रकार बेटियां सबकी सांझी होती है उसी प्रकार कुछ दुख भी सांझे होते हैं भले ही हमारे और उनके दुख की तुलना संभव नहीं फिर भी चूंकि हम भी सरकारी नौकर ही हैं और हमारी भी कथा है। विवाह के 5 वर्ष उपरांत पति को जब नौकरी मिली हम प्रतापगढ़ से गुजरात के सूरत शहर को रवाना हुए। ट्रेन के 2एसी कोच में बैठ हमें असीम सुख की अनुभूति हुई। नौकरी की खुशी तो थी ही साथ शहर भी अच्छा था लेकिन धीरे धीरे एक एक दुख मन मे गहराता गया सबसे पहले जो भाषा का अंतर था उससे किसी तरह सामंजस्य बिठाया फिर बारी आई खान पान की जो इतना कठिन था कि आज दस वर्ष उपरांत भी यहाँ के किसी स्वाद को अपने से जुड़ा प्रतीत न कर पाए, यहाँ न कोई भाई- बहन न ही बचपन के दोस्त कोई रिश्तेदार | इन सबके बिना जीवन आसान नहीं था ,सारे पर्व विशेष अवसर सू...