Bol den agar kursiyan


               बोल दें अगर कुर्सियां!

हाँ एक बार सोच के देखिए | क्या कुछ संभव नहीं इस धरती पे , मान लीजिए अगर ये सच न भी हो सके तो फिर कुछ नहीं | फिर हमारी सोच का संसार तो सपने से भी अधिक विशाल है मेरी नज़र मे अगर कुर्सियों को बोलने का मौक़ा मिल जाए बेचारी बोलने से पहले सिसक उठेंगी येका करुण क्रंदन सत्ता के गलियारे से गुजरने पे आपको स्पष्ट रूप सुनाई देगी | अगर नहीं तो बाए हाथ से बाया कान बंद करके   दाहिने हाथ को दाहिने कान के पीछे लगा कर गर्दन को ज़रा तिरछा कर सुनने की कोशिश आप जनाब ये कोशिश करें कि छात्र के जैसे नवाि होना चाहिए जो अध्यापक द्वारा कक्षा मे अरुचिकर पाठ के समय की जाती है। बल्कि उस बहू के समान हो जो सास - ननंदों के बीच हो रही अपनी बुराई को सुनने के लिए की जाती है और सुनकर घंटों   कुढ़ती जलती है |केवल आप सुनने मे समर्थकों की सत्ता की कुरसियां ​​ऐसा तीव्र विलाप करती हैं जिससे पाशाण हृदय भी द्रवित हो जाए | दिन रात   अपने पे विराजमान देश को दीमक की तरह चाटने वाले भ्रष्ट नेताओं को जी भर के कोसती हैं ये |
         अब तक तो इनपे बहुत कुछ बोला -लिखा जा चुका है ,मैं आज आपको इनके और रूपों से अवगत करने की नीयत से आपके समक्ष उपस्थित हुई हूँ| इतिहास मे इसका एक नाम सिंहासन भी दिया गया था| जैसे सिंहासन बत्तीसी ,और बादशाह शाहजहाँ ने तो सोने चाँदी हीरे मोती से जड़ित मयूर सिंहासन बनवाया मगर वो भी एक पल सुख की सांस नहीं ले पाया |नादिर शाह जी उसे ले गए   बाद मे  कोहिनूर हीरा सुशोभित हो गया महारानी विक्टोरिया के मुकुट पे| इसी क्रम मे आगे मैं ज़िक्र करना चाहूंगी कुछ नादान  कुर्सियों की जो हैं मेरे वतन  लखनऊ  की शान नवाबों की कुर्सियाँ जो पहले तो  झेल रही थी उनके भारी भरकम  शरीर को बाद मे चरमराने लगी उनकी आराम तलब  तबीयत से और बेचारी हत्थे चढ़ गई अग्रेज़ों के और नवाब साहब पेंशन ले कर रिटायर हो गए|
         मुझे तो पसंद है शायरों की कुर्सिया जो ग़ज़ल,गीत और रूमानी कहानियों मे खुद को जीती हैं,गुनगुनाती ,सोचती,मुस्कुराकर अपने साथ को कायम रखने की दुआ करती है की कहीं बिछड़ न जाएँ क्योंकि-

ज़िंदगी है साहब छोड़ के चली जाएगी
मेज़ पे होगी तस्वीर हमारी कुर्सी यूंही खाली रह जाएगी ।

भारतीय वसुधरा को गौरान्वित करने वाली वीरांगना लक्ष्मीबाई की वो कुर्सी जिसपे उनके बैठने और दुश्मनों को खाक चटाने वाली यद्ध की वीरगाथा गाती है 
सुभद्रा कुमारी ने भी लिखा-

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भ्रकुटी तानी थी’|

इस कुर्सी  की हुंकार सदैव गूँजेगी| स्वतंत्राप्राप्ति के तुरंत बाद जब भारत छोटे छोटे राजवंशो मे बंटा हुआ था उस समय भारत के पहले गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की कुर्सी स्वयं अपनी प्रशंसा मे झूम जाती है जिसपे बैठ के उनहोने सभी राज्यों को जोड़ने का फैसला लिया। सबको एक किया, हम उनके ऋणी हैं|
महान विजीनरी भारत को अन्तरिक्ष क्लब का सदस्य बनाने वाले ,हमारे सपनों को पंख देने वाले  राष्ट्रपति ए पी जे अबुलकलाम की कुर्सी तो आज भी उन्हे खोज रही है की काश कोई ऐसा भी आए जो देश को तो परमाणु शक्ति सम्पन्न बनाए पर व्यवहार मे इतना सीधा सरल सहेज हो जो पक्षियों की तकलीफ न बर्दाश्त कर पाए
मुझे तो इन सब कुर्सियों का वार्तालाप सदैव ही अपनी ओर खींचता है| ज़रूरत  इनको सच्चे मालिक की ,जो हमारी भारतीयता को सहेजे |

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