Mera pahla pyar
मेरा पहला प्यार
हिन्दी मेरी मुहब्बत है , फ़ख़्र है , एतमाद है।
एक हिंदुस्तानी होने के नाते जन्म लेने के बाद जो पहला बोल मेरे मुंह से फूटा होगा उसमें शक नहीं कि वह हिन्दी का ना हो।
हिंदी हमारी मातृभाषा है ।
मात्र एक भाषा नहीं है।
50 करोड़ के आसपास लोग हिन्दी भाषा को बोलते हैं। यह हमारी राष्ट्रभाषा है। मगर ऐसा नहीं कि पूरे भारत में यह बोली जाती है। बल्कि भाषा के संबंध में तो कहावत है कि-
भारत में
" कोस कोस पर पानी बदले , चार कोस पर बानी "
इतने बड़े भूभाग के हम स्वामी है। सब भारतवासियों की अलग अलग अंचल की अपनी भाषा है , घर की , प्यार की सब अलग है ।हम उत्तरी भारत के हैं तो हमारा रिश्ता अधिक गहरा है।
कल हिन्दी दिवस था मेरी बहन ने मुझसे सवाल किया ,
अरे हिन्दी से दोस्ती ! ( प्यार से मुझे बुलाती है) आपने कुछ लिखा नहीं।
मैंने कहा हां....
क्योंकि मैं पढ़ने में व्यस्त थी ।
पढ़ना मस्तिष्क का आहार है। पढ़ना लिखना जीवन है।
सांस लेना ( inhalation) पढ़ना है, सांस छोड़ना (exaltation) लिखना है ।
शोशल मीडिया पर हिंदी दिवस को लेकर आई भक्ति की बाढ़ मेरे अपने विचारों को कहीं दूर बहा ले गई।
कहानी थोड़ी पुरानी है हिन्दी से मेरा रिश्ता गहरा करने का श्रेय मैं देना चाहूंगी अपनी अतिप्रिय अध्यापिका चोपड़ा मैम को। वो सिर्फ मेरी ही नहीं हम सब बहनों की चहेती है।(हम एक ही विद्यालय में पढ़ते थे)।
वो इतना अनुशासन मय वातावरण निर्मित कर लगन , ईमानदारी से पढ़ाती थी कि शायद ही कोई छात्र उनका पढ़ाया पाठ जीवन में विस्मृत कर पाए।
उनसे हमारी पसंद के ग्राफ का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि आज 20 वर्ष उपरांत जब अपनी छोटी बहन से मैंने मोबाइल पासवर्ड पूछा तो उसने कहा,
बच्चे सभी पासवर्ड क्रैक कर लेते हैं तो मैंने "चोपड़ा मैम" पासवर्ड लगा लिया। ( बेचारे बच्चे)
ये तो थी मैम की बात जो हिंदी पढ़ाती थी अब आती हूं हिन्दी पर , मेरी प्यारी दुलारी।
मेरे प्यार की पहली विशेषता यह है कि इसे समझने और बोलने में सबसे कम ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है आसान है हमारे लिए।
दूसरा इसकी स्वयं की खासियत है कि ये एक वैज्ञानिक भाषा है। अन्य भाषाओं की तरह इसमें capital letters, small letter का झंझट नहीं , silent की समस्या नहीं ,
लिखो कुछ बोलो कुछ का मसअला भी दरपेश नहीं।
तीसरा यह कि हमारी गौरव हिन्दी प्रगतिशील भाषा है।
इसमें नित नए परिवर्तन आते हैं दूसरी भाषाओं के नए शब्द जुड़ते ही चले जा रहे हैं।
वैसे यह सही है या नहीं पर हो बड़े जोर शोर से रहा है कि हिंदी में पूरी अंग्रेजी उतर आई है। शायद यह जीवन के परिवर्तन के नियम के कारण ही हुआ है।
मैं यह लेख इस लिए लिखने पर विवश हुई की कल जगह जगह पर विभिन्न प्लेटफार्म पर, समाचार पत्र में हिंदी दिवस को लेकर एक खीझ महसूस हुई। उसने प्रेरित किया।
लोग यह कहते दिखाई पड़े कि सब हिन्दी दिवस का झूठा दिखावा कर रहे हैं, या यह हिन्दी प्रेम केवल एक दिन का है ।सब भाग तो अंग्रेजी की तरफ रहे हैं और बोल बाला हिन्दी का मचा रहे हैं। स्वयं को देशभक्त साबित करने के लिए।
पहले मुझे भी ऐसा लगा। फिर शुरू किया विचारों का मंथन वर्तमान समय की आवश्यकता एवं मांग का ।जो परिणाम प्रकट हुए हुए वह कोई बड़े नहीं आप भी अवगत होंगे -
यह जरुरत है , समय की आवश्यकता है, हिन्दी हम बोलते हैं हमारा गर्व है अभिमान है लेकिन दूसरी भाषा से बैर ठीक नहीं।
" भाषा अंतर्मन के भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है"
it's a mode of communication
दुनिया आपस में जुड़ रही है।लोग चांद पर , मंगल पर जा रहे हैं।
तो हमें सिर्फ लकीर नहीं पीटना है
नई नई भाषा सीखना हमारी विद्वता का धोतक है कितने ही विदेशी आते हैं हिन्दी सीखते अपनाते हैं। कितने ही विदेशी विद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है।
वो पुराना रूप वैदिक संस्कृति का अब भले ही नहीं दिखाई पड़े परन्तु आज भी अंग्रेजी माध्यम के विधालय में मेरा बेटा संस्कृत पढ़ता है और फ़ेन्च भी सीखता है।
कल भी और आज भी दूसरे देशों से हमारे प्रगाढ़ संबंध है। आवागमन , व्यापार , शिक्षा दीक्षा का कार्य चलता है तो विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा अंग्रेजी को सीखने तथा वो हमारे लिए कठिन है तो व्यवहार में अभ्यास के लिए प्रयोग करने में बुराई नहीं है।
ध्यान रहे कि हम कभी हिन्दी भूल नहीं सकते वो हममें समाई है बहुत कोशिश के बाद भी विदेशी भाषा का आधिपत्य स्थापित हो नहीं सकता , हमारे लिए कठिन है साहब। तो हिन्दी को दीजिए प्यार दुलार और दूसरी भाषाओं से खीझ का बीज मत सींचिए । आत्मसात कीजिए यही हमारे भारत की सदृढ़ संस्कृति है।
यही मेरा प्यार है सब कहेंगे बड़ा याराना लगता है।
मैं दुनिया की सारी भाषाओं की इज्ज़त करती हूं
मगर हिन्दी मेरा पहला प्यार है।
राबिया
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