Aatmnirbharta ka sukh

             आत्मनिर्भरता का सुख


यह है बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर |एक 13 वर्ष की बच्ची साथ मे है उसका 8 वर्ष का भाई सब्जी बेचते हुए | lockdown मे पिता का मजदूरी व्यवसाय समाप्त हो जाने पे इन्हे इस कार्य पे लगा दिया बाल मजदूरी अधिनियम 1986 का पुरजोर खंडन करते हुए  कि ये गली गली मे सब्जी बेच लेंगे और पुलिस इनको रोकेगी भी नहीं|

हर रोज़ ही इस जहां से हिसाब मांगते हैं 
मन ही मन ये बच्चे किताब मांगते हैं |

इसी लिए ये कहा जाता है  कि बच्चे मासूम होते हैं इन्हे कुछ पता भी नहीं कि क्या कुछ ये खो रहे हैं या कितना जोखिम ये उठा रहे हैं | बल्कि पूरे lockdown के समय ये मुझे हंसी खुशी सब्जी बेचते नज़र आए | मैं कोई रिपोर्टर तो नहीं फोटो तो ले ली इनसे हंसते बोलते मगर मानवता के नाते  चेहरा blur कर दिया है |वैसे भी ये कोई अनोखी तस्वीर तो है  नहीं यदि आप नज़र दौड़ाएँ हर सड़क के चौराहे , नुक्कड़  पे बड़ी आसानी से ये नज़ारा देखने को मिल जाएगा |तो मुद्दा ये है कि बच्चो से मैंने पूछा तुम थकते नहीं सामने से खुशी खुशी  उसका उत्तर था " नहीं , मुझे तो रोज़ का 10 रुपया दीदी को 20 रुपए मिलते हैं "| बस इतना सा ही है इनका आत्मनिर्भरता का सुख जो इन्हे खुशी दे रहा है | फौरन दिमाग कि बत्ती जली और महसूस हुआ कि इनकी ये भावना तो उन व्यक्तियों के सुख के समान है जो चीन कि चालबाज़ियों के विरोध मे 59 एप्स बंद किए जाने पे ही अनुभव कर रहे थे |
हमारी आत्म निर्भरता किसी देश विशेष के विरोध मे निहित नहीं यदि जवाब मे  बड़ी दमदार एप्स लॉंच कर दी जाती तो ठीक भी था |
मेरी द्रष्टि मे पूर्ण आत्मनिर्भरता तो कोरी कल्पना मात्र ही है | हमने अर्थशास्त्र मे पढ़ा था कि अर्थशास्त्र के पाँच अंग होते हैं -
                          3     
                      विनिमय 
        2   उपभोग           वितरण   4
  1    उत्पादन      ✋        राजस्व    5

सम्पूर्ण प्रगतिशील विश्व एक बड़ा बाज़ार है सभी देश उसके अंग हैं और सभी विभिन्न प्रकार कि नीतियों , संधियों , नियमों से बंधे हुए हैं |युद्ध से बचने के लिए ,आपत्ति विपदा मे मदद के लिए , शिक्षा रोजगार के लिए हमे एक दूसरे की मदद दरकार है ।
अर्थशास्त्र के अनुसार देश मे जब एक वस्तु के उत्पादन होता है तो उसकी पूरी उपभोग नहीं हो जाती साथ ही दूसरे देश से विनिमय करते हैं अर्थात लेन-देन |हम किन्हीं वस्तुओं का आयात करते है किन्हीं का निर्यात |इस वितरण से राजस्व प्राप्त होता है जो देश के विकास पे खर्च किया जाता है |मैं यहाँ उस विकास कि बात नहीं कर रही जिसका  पिछले दिनो उज्जैन मे encounter हुआ था jokes apart . असली बात ये है कि भारत की कई नीतियां बनी हुई है जो पड़ोसी देशों से मधुर संबध बनाए रखने से संबंधित हैं। जिसके तहत कई बार कड़वाहट एवं युद्ध तक हो जाने के बावजूद भी आपस में व्यापार को जोड़े रखती है ।
वर्ष 2014 के अनुसार भारत का कुल 

आयात - 462 बिलियन डॉलर
निर्यात - 318.2 बिलियन डॉलर था।

बहुत दूर न जाके पूरे विश्व की बात न करके खास तौर पे बताना चाहूंगी कि हमारे खराब पड़ोसी की जिन्हें संज्ञा दी गई है जी हाँ पाकिस्तान उससे भी हमारा बड़ा व्यापारिक रिश्ता कायम है फल ,मेवे, अच्छे lawn (कॉटन) के कपड़े , प्रत्येक स्त्री को प्रिय मुलतानी मिट्टी वहीं से आती है |चाइना का तो क्या ही कहना उससे तो सरकार सबसे अधिक वस्तु आयात करती है और निर्यात कम जिससे हमे घाटा भी उठाना पड़ता है | चाह कर भी इसपे  लगाम लगाना टेढ़ी खीर है | जैसे - हमारा विश्वगुरु बनने का दावा तब कमजोर पड़ जाता है जब हमे पता चला कि कोरोना मे उपयोगी hydroxychloroquine (बहुत मुश्किल नाम है )दवा के सबसे बड़े उत्पादक हम हैं। जब दवा बनाने की बात आई तो ख़बर हुई इसका कच्चा माल तो चीन हमे निर्यात करता है।
लुब्बे लुआब ये है कि जितना हो सके उतनी देशभक्ति कीजिए बाकी सब पालिटिक्स पर छोड़ दीजिए , राजनीति है सब मियां ।
अंत में ख़ास सिर्फ यह है कि किसी देश को आत्मनिर्भर बनाते हैं वहां के संसाधन । जैसे - भारत विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि में सातवा बड़ा देश है। बहुत ज़मीन है अपने पास , मानव संसाधन में हम विश्व में दूसरे स्थान पर है , वन्य 33% है , खनिज संपदा भरपूर है, कृषि प्रधान देश होने के नाते खाद्यान्न  में हम आत्मनिर्भर हैं। थोड़ी बहुत ऊंच नीच तो चलती रहती है।बस भ्रष्टाचार से मुक्ति मिले मोक्ष मिले समझो ।



Comments

  1. उच्च स्तरीय व्यंग्य 👌👌

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  2. बहुत सही बात कही है आपने। सराहनीय ।

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    1. बहुत शुक्रिया।फिर पढ़ने आना दुबारा

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    2. जी ज़रूर ।

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  3. Wah bhabi.. Dil khush ho gya

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