I can't breathe

I can't breathe 😭


प्रस्तुत टर्म की शुरुआत अमेरिका के हाल ही मे हुए अश्वेत आंदोलन से हुई जब एक श्वेत पुलिस कर्मी ने अश्वेत जार्ज फ्लाएड नामी व्यक्ति का सिर अपने पैरों से कुचल दिया और वह अपनी जान की भीख मांगता रहा ,

" मैं सांस नहीं ले पा  रहा, प्लीज़ रहम करो !"

बहुत ही निंदनीय घटना इस पे जितना रोष जताया जाए कम ही रहेगा|

        अकसर जीवन में कुछ ऐसे पल आ ही जाते हैं| जो दम घोंटू होते हैं| खैर दम तो इस समय सबका घुंट रहा है, भूख से भी, सड़क पे भी ,घर बैठ के भी,किचन मे खाना बना के भी| और खास बात यह है कि आपदा को अवसर मे बदलने को भी तैयार बैठे हैं लोग यहाँ तो। इस कोरोना काल में कितनों का रोजगार छिन गया, तो कइयों का चमक भी गया| किसी का घर जले कोई तापे| करे भी क्यूँ ना,

"सच्चा पूंजीपति होता भी वही है जो फांसी के समय भी आपको रस्सी बेच दे "| 

गरीब भूख से बिलखते रहे, हम खाना बना बना के बर्तन माँजते रहे| दर्द स्त्रियों का भी कोई समझता नहीं, समझ से याद आया जो विश्व के सबसे समझदार देश ठहरे उन्होने भी क्या फोड़ लिया कोरोना केस भी वहाँ कम नहीं, "अब रहे तीन मे ना तेरह में " |समझदारी उनकी गई तेल लेने| हाँ जी अपने यहां भी तो पेट्रोल-डीज़ल के भाव ही समान हो गए| चलो कहीं तो समानता हुई| वरना हम सब तो भेद- भाव के मारे हुए हैं| और भाव यहाँ कौन नहीं खा रहा आज कल सोने के भाव देखे आकाश छू रहे हैं। , स्त्रियाँ बेचारी उनका दर्द बेचारा स्वप्न में भी दर्शन दुर्लभ हो गए|ये बात जुड़ गई यहां इससे कि

"पराधीनता सपनेहुं सुख नाही "|

इतना ज़ुल्म तो गोरे भी नहीं कर पाए उनका खूब विरोध करके भगा दिया| मगर अपना देश अपने ही चुने लोगों को कहाँ भगा दें जब वो विकास न कर पाएँ| हां हम मगर बैठे रहें,बैठे-बैठे करें complain सब ज़िम्मेदारी उनके सिर ओढ़ा के,"पर उपदेश कुशल बहुतेरे "  है , कर्तव्य तो कुछ हमारे भी हैं संविधान के अनुसार | बात तो बार बार उठती है संविधान की , ये धारा वो धारा लो अब बरस गई दिल्ली मे मूसलाधार बरसात इसमें भी गहने बह गए औरतों के किताबें बह गईं बच्चों की नाले मे|

नाला नाला हो गई ज़िंदगी |गली गली मे भर गए ,उबल रहे नाले| उसमे उतर कर साफ करेंगे अछूत,असप्रशय,नीच लोग| कोई दर्द उनका जानता  भी कैसे पास बैठाया नहीं,बोला नहीं,साथ खाया नहीं| जबकि 1993 से ही manual scavanging बैन है| मगर कई राज्यों में साधनों के अभाव के कारण अभी भी ज़ोर शोर से ये प्रथा कायम है| फिर भई बैन तो बहुत कुछ है शराब बैन,दहेज लेना-देना जुर्म |पैसा नहीं तो आप रो रहे लड़कियां दहेज बिना जल रहीं, पैसा है तो अमीर जी भर के दहेज दे रहे तमाशा लगा लगा के |फिर आग लगा के बी जमालों दूर खड़ीं |पेड़ मत काटो बैन है | रिश्वत लेना अपराध है।मेडिकल,एंजिनीरिग की सीट हो या नौकरी हर कोई रिश्वत लेने-देने को तैयार बैठा है|क्योंकि यहाँ सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं| अब सरकार क्या करे ? सब को जेल में ठूंस दे ले जाके,फिर तो जेल की जनसंख्या का अल्लाह ही मालिक|उस विस्फोट का क्या होगा? जेल की रोटी पानी का जुगाड़ ? तो हुज़ूर इलाज जेल नहीं तेल है यानि चंपी करके दिल दिमाग़ रौशन कीजिए| नहीं तो पछतावा ही हाथ लगेगा| दम घुट जाएगा| 

का वर्षा जब कृषि सुखाने ?


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Comments

  1. Kya kren yha kuchh log
    ( apna ullu seedha krne m lge hn. ) to kuchh ( aql k peechhe lathh liye fir rhe hn )

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