Padhna kyun chod dia

Disclaimer- यह ब्लॉग ऐसा कोई दावा नहीं करता कि इसे पढ़कर आप को किसी आनन्द की अनुभूति होगी, यहां खुलेआम आपको पोक किया जा रहा है। जिससे आप को बहुत खिसियाहट, क्रोध आने की संभावना है यदि आप इसे खुले दिल से स्वीकारे तो यह ईद का एक तोहफा है, और तोहफ़े कीमत नहीं देने वाले की नीयत देखी जाती है।


 पढ़ना क्यूं छोड़ दिया ?


"हैरत है! तालीम और तरक्की में है पीछे।

जिस क़ौम का आगाज़ 'इक़रा' से हुआ था।"


आप सब इतने काबिल है कि मुझे इसका अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं फिर भी कहती हूं जब पैग़म्बर मुहम्मद (सअव)को नबूवत मिली, फरिश्ते जिबरील (अस) उनके पास अल्लाह की किताब कुरान की पहली आयत(verse)लाए और बोले- "इक़रा बिसमी रब्बेक़ल्लज़ी ख़ल़क़"। अर्थात- पढ़ो ऐ नबी अपने रब के नाम से जिसने कायनात बनाई।

तो पढ़ना इतना महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले ही पढ़ने की बात की जा रही है।

Census of India के आंकड़ें तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं

भारत की सक्षरता दर-

पुरुष- 75.3%, स्त्री- 53.7%

वैसे तो  पढ़ाई का धर्म से कोई लेना देना नहीं है फिर भी यहां सिर्फ प्रकाश डालने की गर्ज से प्रस्तुत कर रही हूं -

धर्म                  साक्षरता दर

जैन                    94.1%

इसाई                 80.3%

सिख                  69.4%

हिन्दू                  65.1%

मुस्लिम               59.1%

ये तो हुई साक्षरता अर्थात केवल अक्षर ज्ञान की जबकि शिक्षा इससे कहीं अलग है। Education का शाब्दिक अर्थ-E- मतलब अंदर से एवं Duco-आगे बढ़ना, अर्थात मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित करना। शिक्षा inculcate करती है मनुष्य में मानवता की समझ को। ये स्वयं एवं दूसरों और देश के बीच गहरा संबंध स्थापित करती है।

प्राचीन काल में तो शिक्षा अच्छे रूप में थी जबकि बाद में अंग्रेजीअफसर मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य तो भारत में सिर्फ लिपिक (clerk) या नौकर ही भर दिए। तो अच्छे लीडर् कहां से आए जो lead by example करें।

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री भूले तो नहीं होंगे आप उन्हें आप मौलाना अबुल कलाम आज़ाद। आपने भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति में बहुत सुधार कार्य किए। साहित्यअकादमी   संगीत नाटक अकादमी जैसे संस्थान से लेकर University grant commission, और जो भारतीय इंजीनियर देश विदेश में धूम मचाते हैं उनका प्रमुख संस्थान IIT की स्थापना का श्रेय भी आप को ही जाता है।इसी कारण वर्ष 2008सेआपके नाम से शिक्षा दिवस मनाने की शुरुआत की गई है।

फिर चूक यह हुई कि शिक्षा पे बल तो शुरू से बल दिया गया परन्तु किन्हीं सामाजिक कारणों या उबाऊ पाठ्यक्रम के तहत रुचिकर नहीं बन सकी दुखद ये कि पढ़ना सबको रास नहीं आया, ये एक tough taskबनके उभरी कमाई के स्रोत के रूप में,अब ये बोझ सर पे मुसल्लत है। नंबर लाने के लिए पढ़ो, परीक्षा निकट आए तो थर-थर कांपो,खराब परिणाम आए तो आत्महत्या एक आम बात है।

आप बोलेंगे हम ने तो दिल लगा कर पढ़ाई की, पोजीशन भी ली सत्य तो यह है मित्र वो वक़्ती थी डिग्री लेने के बाद समाप्त।

"जो पढ़ा लिखा था नयाज़ ने उसे साफ़ दिल से भुला दिया"।

आज भी याद है वो दिन जब अपिया आप बी ए का examदेके आई कितनी खुश थी,बार बार गाती जाती--आज मैं उपर आसमान नीचे। फिर दुबारा तो किताबें खुली नहीं। धीरे धीरे शिक्षा हमसे दूर हुई अब तो अक्षर भी अंजान होने की कगार पे हैं उदाहरण देखिए---20या25 साल पहले आपने हाईस्कूल प्रथम श्रेणी से पास किया तो अब अपने ही हाईस्कूल के बच्चे की किताब का एक पाठ भीexplainकरने में हमें दांतों पसीने छूट जाएंगे।एक और उदाहरण plz बुरा मनाईए, ज़माना बदल गया मगरlacto calamine के जैसे हम अभी भी वही है देखिए कैसे-हम सब को शौक है अपने oppo,vivoफोन सेselfieलेने का इसी फोन से यदि कोई हमें कहे money transaction, account kyc, travel tickets booking, या सबसे छोटा system hang rebootकीजिए….. सन्नाटा। हमारी ब्यूटी हो गई प्लस से माइनस,हम हो गएbeauty without brain.

पढ़ाई के लिए चहिए प्यार जो जीवन भर चले learning is a life long process,सब जानते मानते हैं कि हम लोग एक कुशल गृहिणी है इसी व्यस्त जीवन मेंedit करना है कहीं से समयcut कर के कहींpaste तो हम हो जाएगे update. बच्चों की NCERT की किताबें कम नही इसे पूरे भारत में पढ़ने के लिए गठित की गई बड़ी समिति द्वारा निर्धारित किया जाता है,हर तरह से बच्चों के संपूर्ण विकास को दृष्टि में रख कर एक एक lessonका चयन होता है। बच्चे के मित्र बन साथ हम भी पढ़ें तो काम बने। यदि आप पहले से ही ऐसा करती है तो बधाई ।

सा विधा या विमुक्तये

हां पढ़ना मत छोड़िए, पुरुष पढ़ता है तो वह स्वयं मगर स्त्री से पूर्ण समाज।समाज में व्याप्त सभी बुराई पुरुष की या स्त्री की सबकी अधिक जिम्मेदारी स्त्री को लेनी होगी वही तो दोनों की ही मां है।ये काम शिक्षित होकर संभव है

विधा ददाति विनयं,विनयाद् याति पात्रताम।

पात्रत्वात धनमाप्नोति धनात धर्म तत:सुखम।









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