Pravas hi niyati thahra

प्रवास ही नियति  ठहरा!


 वर्तमान कोरोनाकाल में मई माह में जो प्रवासी मजदूर सड़क पर चल रहे,रेल पटरियों पर कट रहे, सड़क दुघर्टना में मर रहे उनकी दुर्दशा और दुख का अंदाजा मात्र भी हम नहीं लगा सकते अपने फुल ऐसी के कमरे में बैठ मनपसंद इंग्लिश फिल्म के साथ घर में बने पिज्जा बर्गर खाते समय।

 जिस प्रकार बेटियां सबकी सांझी होती है उसी प्रकार कुछ दुख भी सांझे होते हैं भले ही हमारे और उनके दुख की तुलना संभव नहीं फिर भी चूंकि हम भी सरकारी नौकर ही हैं और हमारी भी कथा है। विवाह के 5 वर्ष उपरांत पति को जब नौकरी मिली हम प्रतापगढ़ से गुजरात के सूरत शहर को रवाना हुए। ट्रेन के 2एसी कोच में बैठ हमें असीम सुख की अनुभूति हुई। नौकरी की खुशी तो थी ही साथ शहर भी अच्छा था लेकिन धीरे धीरे एक एक दुख मन मे गहराता गया सबसे पहले जो भाषा का अंतर था उससे किसी तरह सामंजस्य बिठाया फिर बारी आई खान पान की जो इतना कठिन था कि आज दस वर्ष उपरांत भी यहाँ के किसी स्वाद को अपने से जुड़ा प्रतीत न कर पाए, यहाँ न कोई भाई- बहन न ही बचपन के दोस्त कोई रिश्तेदार | इन सबके बिना जीवन आसान नहीं था ,सारे पर्व विशेष अवसर सूने ही बीत जाते अक्सर,फिर दोस्ती बनाने का कार्य शुरू होता बहुत प्यारे दोस्त बन भी जाते साथ ही बैंक नियमानुसार साल दर साल होने वाले ट्रांसफर की भेंट चढ़ जाते , उनसे रो धो के विदा लेकर नई जगह डेरा जमता |हम आज भी गुजरात की नज़र मे लखनऊ वाले और लखनऊ वाले हमे गुजरात वाली बहन नाम से याद करते हैं |

याद ए माज़ी अज़ाब है या रब

छीन  ले मुझसे हाफिज़ा मेरा |

अपनी प्रवास कथा का वर्णन केवल इस मंशा से किया की मुझे लगता है की मेरा दुखी हृदय प्रवासी मजदूरों के दुख को बेहतर समझता है मुझे कोई sympathy ज़ाहिर करने की आवश्यकता नहीं अब यहाँ कार्य empathy करेगी हमारा दिली ग़म एक है ।

प्रवास तक तो ठीक परंतु जब मजदूर शब्द इसके साथ जुड़ जाता है तो बहुत ही दयनीय चित्र उपस्थित होता है उसका वर्णन कठिन है|

अपने ही शहर मे मजदूरी करना एक अलग बात है , अन्य की भांति वो भी अपने श्रम बेचकर जीविकोपार्जन कर लेता है , हाँ मजदूर का तबका सबसे छोटा होने के इसका मानदेय श्रम की तुलना मे नहीं के बराबर होता है|तभी जो समस्याएँ खड़ी होती हैं उनकी कतार इतनी लंबी होती है जिसे गिनवाया नहीं जा सकता,इन्ही समस्याओं को एक एक करके दूर करते करते हमारे मजदूर भाई इतने दूर निकल जाते हैं की उनके पास कुछ भी नहीं बचता |बचता है तो बस हर दिन कार्य जैसे -

लोगों ने आराम किया और छुट्टी पूरी की ।

एक मई को भी मजदूर ने मजदूरी की |


2011की जनगणना के अनुसार लगभग 45 करोड़ मज़दूर जो अपना घर बार त्याग कर परदेस जाने का चयन करता है उसका एकमात्र कारण पैसा कमाना नहीं होता है |गाँव मे अधिकांशता मूलभूत सुविधाएं जिनमे बिजली पानी की समस्या ,कृषि संकट ,अपनी भूमि से बेघर ,अत्यधिक जातिवादी शोषण सम्मिलित हैं| मेरी द्रष्टि मे दो मुख्य कारणो मे प्रथम है शिक्षा का आभाव इसमे व्यावसायिक शिक्षा भी,दूसरा शहरों की चमक दमक और आकर्षण सबको गाँव से अपनी ओर खींचता है |गांधी जी ने एक बार कहा था गाँव हमारे लिए जन्नत के समान है|मगर सुविधाओं के अभाव मे ये जन्नत किसे रास आएगी |

बचपन मे अर्थशास्त्र विषय में एक चक्र पढ़ा था उसका इस समस्या से घनिष्ठ संबंध जान पड़ता है,यदि इस चक्र को तोड़े तो समस्या ठीक हो सकती है |

अशिक्षा

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गरीबी बेरोज़गारी

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अपूर्ण आवश्यकताए


ये सभी कारण मूलतः भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले और उसी से जन्म लेने वाले होते हैं। सरकार की कई नीतियां गांव में शिक्षा एवं रोजगार संबंधित बनी हुई है। ये केवल भ्रष्टाचार रूपी काल का ग्रास बन गई।एक संदेश मैं देना चाहती हूं कि प्यारे  भाईयों जिन फूलों के बाग़ की चाहत में तुम अपना चमन छोड़ जाते हो वहां कोई तारों भरा आकाश तुम्हारे लिए मुन्तजिर नही। यदि मेरी बात सच ना होती तो हर बड़े सुंदर शहर के दूसरे किनारे पर सीलनज़दा, अंधेरी,संकरी गलियों , गन्दी बदबूदार बजबजाती नालियों , बिना किसी मूलभूत सुविधाओं वाले स्लम ना होते।अक्सर रातों को सोने के लिए फुटपाथ न होते |किसी ने कहा है 

ज़रा धीरे चलो इन रस्तों पे मेरे भाई 

मजदूर यहाँ अपनी ख्वाबगाह मे सोए हैं |

आप एक मशीन न बने होते ,

चुनाव में राजनीतिक कठपुतली न बनते |फिर भी कुछ अच्छे लोग भी हैं काश आपको इनका सहयोग मिले |अपने सपनों का संसार सजाने के लिए आपको खुद जाग्रत होने पड़ेगा यदि आप खुश हो जाएँ तब थोड़ी खुशी दूसरे ज़रूरत मंद मे भी बाँट दीजिएगा |और अपनी कोशिश जारी रखिए

जिस मिट्टी ने लहू पिया ,

वो फूल एक दिन खिलाएगी , अंबर पे घन बन छाएगा उच्छवास तुम्हारा |

और अधिक ले जांच देवता इतना क्रूर नहीं ,

थक कर बैठ गए क्या भाई |मंज़िल दूर नहीं | 

                           राम धारी सिंह दिनकर 







Comments

  1. बहुत सुंदर
    बहुत अच्छा लगा मजदूरों के प्रति
    आपकी हमारी संवेदना, बेचारे कहाँ कहाँ भटक रहे.......
    सारे देश की लगभग सहानुभूति है इनके प्रति होनी भी चाहिए।
    लेकिन इस संकट की घड़ी में केवल मजदूर ही प्रभावित नही है वो भी जो सरकारी सर्विस में नही ,न ही मजदूर न ही वो अपने आप को दुनिया के सामने दिखा सकते है कि वो गरीब है मेरे समझ मे वो सबसे ज़्यादा परेशान हैं मानसिक रूप से ।
    उनको न कोई सहायता मुफ्त अनाज इस अन्य मदद जो इन मजदूरों को मिल रही इनके तरफ भी ध्यान जाना चाहिए जैसे-प्राइवेट सर्विस वाले छोटी दुकान वाले, खुद का कारोबार करने वाले खास कर मिडिल क्लास फैमिली जो सारे टैक्स भर रही वेतन भी कटवा रही वो भी इस कोरोना से कम प्रभावित नही है।
    धन्यवाद।

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