Aaj inpe guzri kal hampe na guzre
आज इनपे गुज़री कल हमपे न गुज़रे|
ये आँख चुराने का समय नहीं | आज से चार वर्ष पहले मैंने "तर्क संगत नहीं आत्महत्या पे मौन " नामी शीर्षक से ये लेख लिखा था बैंक की e-magazine भावभूमि मे छपने दिया था| और अब दुबारा इसकी ज़रूरत पड़ गई ऐसा मेरा विचार है |शुरुआत यहाँ से हुई-
वर्ष 2016 television ऑन करते ही समाचार उद्घोषिका की आवाज़ से मैं एक क्षण को स्तब्ध रह गई , "जानी मानी Tv कलाकार प्रत्यूशा बनर्जी ने आत्महत्या कर ली "| इस बात की तह मे ना जाते हुए ये हत्या है या आत्महत्या,मेरे मन मे दुख की एक लहर उठ गई |ये क्या हो गया है हमारे आज के समाज को ,चारों तरफ बार बार आत्महत्या की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही उठने लगी है | फिर खयाल आया कि जीवित रहना और जीवन के लिए संघर्ष करना क्या अब कुछ ज़्यादा ही कठिन हो गया है |एक शायर के अनुसार
"ख़ुदकुशी के लिए थोड़ा सा ये काफी है मगर,
ज़िंदा रहने के लिए बहुत जहर पिया जाता है|"
सब कुछ सुन जान के भी हम चुप रह जाते हैं इसके बारे मे ज़्यादा बात नहीं करते हमे लगता है ये कुकृत्य अक्षम्य अपराध है |ये व्यक्ति स्वयं का हत्यारा है आदि आदि परंतु दिल पे हाथ रखके देखिए तो लगता है हम सब सामान्य मानव है कभी न कभी किसी दुखद परिस्थिती से घबराके कम से कम एक बार तो अवश्य अनायास ही हमारे मुख से ये निकला होगा कि "ए ऊपर वाले ! मैं इस जीवन से तंग आ गया हूँ मुझे उठा ले " या " इस जीवन से तो मौत भली " आप माने या न माने ये सत्य है इसी कारण हम सोचते हैं जो हो गया सो हो गया जाने दो| यही विचार हमे चुप करा देता है |
एक बात जो आत्महत्या के विपक्ष मे जाती है वो ये कि किसी भी धर्म मे इसका कोई स्थान नहीं |इस्लाम मे इसे हराम और हिन्दू इसे पाप कहते हैं | अन्य धर्म और दर्शन भी ऐसा ही विचार रखते हैं |प्राचीन दार्शनिक प्लेटो ने तो यहाँ तक कहा कि "हम मानव भगवान के एक सिपाही हैं ,जो अत्महत्या करे वो भाग जाने वाला सिपाही है "|सचमुच मे ये विश्वासघात ही तो है |हम सभी धार्मिक मान्यताओं से बंधे हुए है कुछ हद तक मैं इसे सही भी मानती हूँ |
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण इससे कुछ अलग है मेरे विचार मे मनोविज्ञान मन का विज्ञान है तो मानव मन को समझने के लिए ये अधिक सक्षम है |व्यक्ति की मनः स्थिति ही नहीं वरन वाह्य परिस्थिति भी इस कृत्य के लिए बराबर जिम्मेदार हो सकती हैं एक साधारण मनुष्य के लिए हत्या करना सरल नहीं चाहे स्वयं कि या दूसरे की |वर्तमान मे जो सामाजिक दशा है कि विश्व भर मे एवं भारत मे आठ से दस लाख लोग प्रतिवर्ष अत्महत्या करते हैं |हमारे किसान ,युवा ,सरकारी कर्मचारी ,फिल्म जगत के नाम चीन कलाकार विशेषतः जीवन मे अधिक सफलता प्राप्त कर चुके व्यक्ति भी किसी कारणवश इस कार्य को बाधित हो जाते हैं मनोविज्ञान के जनक फ्रायड कि माने तो "किसी प्रिय इच्छा के अपूर्ण रह जाने पे व्यक्ति क्रोध स्वयं उतरता है"| हम परिस्थिति से भागने का प्रयास करते हैं हालांकि सभी भगोड़े नहीं होते पर आत्महत्या का उपाय तब सबसे सरल प्रतीत होता है जैसे किसान के संदर्भ मे ;
"भूख मे जहर खा के मर गया इंसान|
लोग कहते है कि इसने ख़ुदकुशी कर ली "|
ध्यान देने वाली बात यह है कि भगवान कि सर्वश्रेष्ठ रचना मानव भिन्न भिन्न प्रकार कि भावनाओ का मिश्रण हैं किसी मे तनाव सहने कि क्षमता अधिक तो किसी मे कम कोई विजयी कोई पराजित |किसी दूसरे को नहीं बल्कि अब हमे खुद को ही समझने कि आवश्यकता है जागरूक रहना है प्रतिक्षण ,परिवार या कहीं समाज मे हमार आसपास कुछ गलत लगे तो उससे उबरने कि जुगत करना हमारा फर्ज़ है| व्यापक उपाय यह हो सकता है कि प्रशासन एवं स्वयंसेवक संस्थाएं जो पहले से ही इस क्षेत्र मे कार्यशील हैं उनके प्रयास सफल तब होंगे जब हम आम नागरिक भी इसमे हाथ से हाथ मिलाएंगे नहीं तो अंत बहुत भयावह हो सकता है,हमे कभी भी वो कारण नहीं बनना है जो इसके जिम्मेदार होते हैं जैसे देखिए नज़र दौड़ाइए खुद पे आप वो बॉस तो नहीं जिसके pressure से employee ये कदम उठाले ,हम वो जमींदार : साहूकार तो नहीं जिसका किसान भूखा हो अंत मे हम वो parent तो नहीं नहीं कभी भी नहीं |हमे चोटिल नहीं शक्तिशाली हो के आगे बढ़ना है |
ये लेख मेरी सुशांत सिंह राजपूत को श्रृद्धांजलि स्वरूप है |बाद मे हमे यह न कहना पड़े कि -
शिकस्त खा के अँधेरों कि हुक्मरानी से |
हमारे देश के सूरज ने खुदकशी कर ली |
बहुत सही है
ReplyDeleteAap ka lekh padh kr kuchh yad a gya
ReplyDelete"Hr qdm pr koi qatil h kaha jaye koi zinda rhna bda mushkil h kha jaye koi. "