Dr. Dave
दिल के नहीं मगर दिल से सच्चे डॉक्टर की कहानी।
डॉक्टर दवे
एक छोटे से शहर में थोड़ी पुरानी बिल्डिंग में था अमेरिका में पढ़ कर काफी जीवन बिताकर लौटे अधेड़ उम्र के मालिक डॉक्टर दवे का क्लीनिक। शहर में बच्चों के ख़ास और अच्छे डॉक्टर होने के साथ-साथ कई दूसरी विशेषता भी थी जिसके लिए वह जाने जाते थे।
इन्हीं से अब वास्ता पढ़ने वाला था राकेश और उजाला दंपति का जो अपने 5 वर्ष के बेटे कृष के बार बार बीमार पड़ जाने को लेकर परेशान थे।
क्लीनिक के बाहर टंगा बोर्ड :
सुबह का समय- 6:00 बजे से केवल 5 लोग
शाम का समय - 4:00 बजे से केवल 5 लोग
इमरजेंसी के समय परेशान ना करें कहीं और दिखा ले। डॉक्टर को कभी भी फोन ना करें।
उजाला - हांय.... , एजी देखो बोर्ड पर क्या लिखा है ( मंद मंद मुस्काते हुए)
राकेश - ओहो ... ऑफिस के दोस्तों ने इनके बारे में बताया तो था कुछ अजीब चलो देखते हैं।
रिसेप्शन का आदमी - पर्ची बनवानी है , बच्चे का नाम , उम्र, बीमारी क्या है ?
उजाला - क्रश , 5 वर्ष , बार-बार सर्दी जुखाम हो जाता है कमजोरी बुखार।
आदमी - बस,...... हां ! बाकी डॉक्टर को बताना ।
राकेश - कितना टाइम लगेगा ?
आदमी - टाइम नहीं है तो यहां क्यों चले आए ? नए पेशेंट को एक घंटा लगेगा ।
( उजाला राकेश के कान में मुझे तो यह आदमी ही ख़ुररांट लग रहा है। सिर्फ पांच लोगों को देखते हैं फिर भी इतना गरम हो रहा है ।)
राकेश - चलो इंतजार करते हैं
( कमरे से डॉक्टर की तेज तेज किसी महिला को डांटने की आवाज आ रही थी )
डॉक्टर - यह क्या है बच्चे को हगीज़ क्यों पहनाई है अपनी आसानी के लिए तुमने इसको परेशान कर रक्खा है । क्यों भाई साहब अगर आपका पैजामा गीला रहे तो आप सो , टहल , घूम सकते हैं । जो बच्चे पर ज़ुल्म कर रहे हैं फिर कहेंगे बच्चा रोता है ।
( उजाला ने झट राकेश का हाथ पकड़ लिया मुझे बहुत डर लग रहा है )
राकेश - हां वही तो भरत भाई भी कह रहे थे जब वह अपनी छोटी छोटी दो बेटियों को लेकर आए थे तो डॉक्टर ने उनकी बहुत हजामत बनाई कहा इतने बच्चे क्यों पैदा कर लिए फिर संभाल नहीं पाना । कुछ ऊंच-नीच हो जाए तब रोना।
उजाला - बताओ जरा यह कोई बोलने की बात है ?
रिसेप्शन का आदमी - आप लोग चुप रहिए शोर ना करिए ।
( उजाला मन ही मन शोर तो केवल डॉक्टर ही कर रहे हैैं।)
आधे घंटे के बाद
आदमी - जाइए आपका नंबर आ गया ।
उजाला - राकेश तुम आगे जाओ मेरा तो दुबला पतला बच्चा है मुझे बहुत डांट पड़ने वाली है ।
राकेश - (अंदर जाते हुए ) गुड मॉर्निंग डॉक्टर साहब !
डॉक्टर - आइए बैठिए क्या परेशानी है ? आप क्या करते हैं भाई साहब ?
राकेश - मैं इंजीनियर हूं यहां नया नया आया हूं। (तभी राकेश के फोन की बेल बज गई ) सर मैं अभी आता हूं
उजाला- डॉक्टर साहब मैं तो हाउसवाइफ हूं । यह बच्चा बीमार हो जाता है जल्दी-जल्दी । कुछ खाता भी नहीं है ।
डॉक्टर - तो आप कहीं नौकरी कर लीजिए । हर वक्त बच्चे के सर पर सवार होना ठीक नहीं । आजकल के मां-बाप की दो ही परेशानी है। बच्चा खाता नहीं , पढ़ता नहीं है ।
रोशनी - (धीरे से) नहीं.... यह तो अच्छे से पढ़ता है ।
(राकेश वापस आकर सॉरी डॉक्टर)
डॉक्टर ध्यान ना देते हुए बीमारी पूछते हैं और बोलते हैं बच्चे के साथ मेहनत करनी पड़ती है खाता नहीं है तो कोशिश कीजिए ।
रोशनी - अरे डॉक्टर साहब ( सकपकाते हुए )मैं तो बहुत मेहनत से पूरा एक घंटा लगा कर कभी प्यार से कभी डांट कर तो कभी मार कर खाना खिलाती हूं।
डॉक्टर - मार के ! यह क्या बात है ? आप अपने ही बच्चे को मार रही हैं अभी भाई साहब आपको मारें तो आप डायवोर्स ले लेंगी इसीलिए बच्चे बड़े होकर मां बाप से डायवोर्स ले लेते हैं।
अच्छा बताइए क्या चीज शौक से खाता है ?
उजाला - सिर्फ दूध पीता है ।
डॉक्टर - मां का दूध तो भगवान सिर्फ 2 साल के लिए बनाते हैं आप जो भैंस का दूध इसे पिलाती हैं वह भैंस के बच्चे के लिए है । आपके बच्चे के लिए नहीं । दूध बंद कीजिए इसका फौरन और खाना खिलाइए । दूध 50% से ज्यादा लोगों को हजम नहीं होता । नुकसान करता है । जाकर गूगल कर लेना ।
( राकेश मुस्कुराने लगा )
डॉक्टर - जो बच्चे को बार बार सर्दी लग जाती है वह है एलर्जी साफ - सफाई का बहुत ध्यान रखना होगा चादर , तकिया, दुलाई , मच्छरदानी रोज धोने हैं । खिलौने डेटाल से साफ करो । पानी आरो का नहीं उबाल के देना है ।
उजाला -( कुछ परेशानी से ) रोज धोने हैं ?
डॉक्टर -( अब कुछ मुस्कुराने लगे ) हां ....
डॉक्टर - यह मैंने दवाई लिखी है । भाई साहब आप समझिए इसको कैसे दवाई देनी है । सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं दोनों का बच्चा है ।
( अब सकपकाने की बारी राकेश की थी )
राकेश - जी डॉक्टर साहब समझ लिया ।
डॉक्टर - बच्चे को जो सांस की तकलीफ है । इसको भाप देनी होगी दिन में दो बार ।
पहला रात के 12:00 बजे
दूसरा सुबह के 5:00 बजे ।
उजाला -( घबराते हुए ) टाइम तो कुछ अजीब है बच्चा सोता रहेगा ।
डॉक्टर - तो उठा देना यही सही टाइम है ।
उजाला - उदासी से जी ठीक है। ( मैं भी तो सोती रहूंगी मन ही मन बोली )
डॉक्टर - दवाएं भी सुबह दोपहर शाम नहीं पूरे 24 घंटे को तीन भागों में बांट लो
सुबह 6:00 बजे
दिन में 2:00 बजे
रात में 10:00 बजे दवा देनी है ।
राकेश - जी ठीक है डॉक्टर साहब और आपकी फीस ।
डॉक्टर - अगली बार फीस देना जब बच्चा ठीक हो जाए तब । पैसे के लिए नहीं शौक के लिए पेशेंट देखता हूं।
( दोनों बाहर के मेडिकल स्टोर से दवा लेते हैं मेडिकल स्टोर वाला मुस्कुरा रहा है )
मेडिकल स्टोर वाला - क्यों पहली बार आए हैं ? तब तो अच्छी चटनी बनी होगी ।
( दोनों झूठी हंसी हंसते हुए)
राकेश - उजाला अब तो तुम्हें मेहनत करनी होगी ।
उजाला - तुम्हें भी हां दवा तो तो तुम्हें ही खिलानी है ।
1 हफ्ते के बाद
( राकेश और उजाला डॉक्टर के क्लीनिक पर आते हैं)
डॉक्टर - कैसा है बच्चा ?
उजाला - ( खुशी से .....) तबीयत अच्छी हो गई डॉक्टर । लेकिन इसका छोटा भाई है उसे भी यही परेशानी हो जाती है ।
डॉक्टर - अगर अब तीसरा बच्चा होगा तो उसको भी यही परेशानी हो जाएगी समझी ।
( उजाला हक्का-बक्का रह जाती है)
राकेश - डॉक्टर पहले थोड़ी मुश्किल हुई पर घर जाके हमने सोचा तो आपकी बात हमें काफी अच्छी लगी ।( तभी राकेश के फोन की बेल बज जाती है )
डॉक्टर - काटिए फोन ! बहन जी आप मुझे ज्यादा समझदार लग रही हैं राकेश की तरफ इशारा करते हुए जब आपके पास समय नहीं है अपनी नौकरी से तो इससे पैदा ही क्यों किया था । पूरी बात मेरी ध्यान से आप सुन नहीं रहे हैं।
( राकेश घबराकर सारी बोलने लगा )
डॉक्टर - दवाई ले ली अब दोबारा आने की जरूरत नहीं बच्चा अच्छा हो जाएगा ।
रोशनी - डॉक्टर मुझे लगता है कि मैं एक अच्छी मां नहीं हूं मेरा बच्चा बार बार बीमार होता है ।
अब डॉक्टर के स्वभाव में कुछ नरमी आई ।
डॉक्टर- नहीं ! बस थोड़ा ध्यान रखिए नहीं तो बच्चा मुझ जैसा डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा जो जीवन में बहुत कुछ पा लेने के बाद भी परेशान रहता है ।
राकेश - आप तो बहुत अच्छे हैं ।
डॉक्टर - अब दोबारा मत आना एक ही पेशेंट को मैं बार-बार नहीं देखता । फिर सबके लिए समय नहीं मिलेगा एक ही बार देखता हूं प्यार से ।
बाहर निकल कर राकेश और उजाला हंसते हुए कहते हैं डॉक्टर साहब प्यार से देखते हैं।
( एक सच्ची कहानी है जो कुछ को अजीब लग सकती है मगर यह घटना एकदम सत्य है पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं । ध्यान से समझा जाए तो डॉक्टर का नजरिया बिल्कुल सही था )
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