Vo kyun hansti hai ?
वो क्यूँ हंसती है ? ☺
नील नभ पे बियाबान मे, है भटक रही
क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी ?
ओफ़्फ़ अभी किचन से कमरे मे आई ही थी की बाहर बेल बज गई यहाँ कौन हमे जानता ही है जो इस समय आ गया ? दरअसल हम ठहरे बैंकर परिवार
हर तीन साल मे होने वाले तबादलों के मारे एक सप्ताह भी नहीं हुआ था अमरेली से भावनगर आए हुए |शुक्र है पैकर मूवर्स का जो समान रखने उठाने की बचत हो जाती है |फिर भी चार दिनो से मैं घर ही सेट करने मे ही मसरूफ़ हूँ | खैर दरवाजा खोला तो सामने एक अधेड़ उम्र की, मझोले कद काठी एवं साँवले रंग आम से नक्श-ए-निगार की महिला खड़ी मुस्कुरा रही थी| जिस चीज़ ने मुझे आकर्षित किया वो थी उसकी हंसी| मुझे जानती नहीं फिर भी हसने की हद तक मुस्कुरा रही थी |साथ मे थीं मेरी नई पड़ोसन |मुझे देखते ही तपाक से बोली "आपने घर काम के लिए बोला था ना ये है मासी ,अच्छा काम करती हैं |ख़ास बात ये है की छुट्टी भी नहीं करती | नाम है महफूज़ा बेन"| मन ही मन मैं अपनी भली पड़ोसन की एहसान मंद हो गई मैंने उत्सुकता वश पूछा, "छुट्टी क्यूँ नहीं करती"?
उनके द्वारा दिया गया उत्तर आज भी मेरे हृदय को झकझोर जाता है | "इनका कोई है नहीं ना तो कहीं जाना आना होता नहीं "| अफसोस ! ये बात उनकी प्रसन्नता का कारण बन गई ,मुझे कोई जवाब देना मुनासिब न जान पड़ा |
ये है हमारा आधुनिक अहंवादी समाज , नीतिशास्त्र की मानू तो मनुष्य मूल रूप से सुख की खोज कर रहा है | यह अपने उथले रूप मे एन्द्रिक सुखो पे केन्द्रित रहता है हम अपनी ही खुशियो पे बल देते हैं |
पड़ोसन के धन्यवादोत्परान्त मासी को घर के अंदर आने का इशारा दिया |उन्हे काम समझाया कि सिर्फ झाड़ू-पोछा ही करना है वो भी मुझे कमर दर्द की समस्या रहती है तो वरना घर का काम मैं स्वयं ही करना पसंद करती हूँ |अब उनका चेहरा कुछ उतरा फिर भी बोली "अरे नहीं ! मैं तो सब काम अच्छे से करती हूँ आप खुश हो जाओगी , मैं तो ज़्यादा काम सोच कर आई थी" |चलिए पहले इतना कर लीजिए फिर देखते हैं जवाब में मैंने बोला| बड़ी फुर्ती से काम निपटने के बाद वो फिर मेरे पास आई और मुसकुराते हुए बोली मैं जा रही हूँ ,मेरा काम पसंद आया ना? किसी भी प्रकार के थकान का नाम-ओ-निशान नहीं ढूंढ पाई मैं उसके मुख पे |
अब तो सप्ताह क्या पंद्रह दिन बीत गए मेरी कुछ दोस्ती सी हो गई थी |मैं जान गई की ये मुस्कुराने के साथ साथ बातें भी करने की शौकीन हैं |शहर मे नया जान मुझे नित नए मशवरे नवाजती जैसे -पति और बच्चों के स्कूल जाने के बाद जो मैं ज़रा लेट जाती तो वो उसे टोकती "इतना क्यूँ सोती हो ? " या फिर बाल्कनी मे फैले सूखे कपड़ों को उठा ला के अपनी भाषा मे बोलती "रक्खो ये, सब बोलेंगे ई बाई सही नहीं है"। खासतौर पे मेरा 4 वर्ष का छोटा बेटा जो ज़रा गुस्से का तेज़ है उसके बारे मे बोलती "इसके तो बड़ा पावर है |लखनऊ वाले ऐसे होते हैं क्या? हमारे लखनऊ वाले होने की बात पे व्यंग्य करती |मुझे उसकी बातें पसंद आती मैं भी हंस कर कहती," भावनगर का पानी इसे लग गया है भावनगर वाले ऐसे होते हैं ना "|
अब जब इतने दिन हो गए तो बड़ी हिम्मत जुटा कर मन मे पहले दिन से चल रहे सवाल को उनके समक्ष रख ही दिया मन मे खौफ था की ये उदास हो जाएंगी ,दिल दुखाना ठीक नहीं मगर अपने को रोक नहीं सकी ,"आप अकेले क्यूँ रहती हैं ? सब कहाँ हैं ?
स्नातक एवं परास्नातक मे जो दर्शनशास्त्र एवं मनोविज्ञान जैसे विषय मैंने पढे थे वो अभी भी जीवन के कई पहलुओं मे अपने नियमों और व्याख्याओं के साथ मेरी मदद भी करते और परेशान भी , मैं सिगमंड फ्राएड की काउच थेरेपी की तरह उसके दिये उत्तर एवं जेसचर -पाश्चर पे गंभीर नज़र रक्खे थी |काफी पैनी नज़र है मेरी लोगों को पहचानने की ऐसा पतिदेव अक्सर बोलते हैं लेकिन यहाँ तो बड़ा साधारण उत्तर दिया उन्होंने ,"हाँ तो कोई है नहिं ना " ,एक क्षण को सपाट होता हुआ चेहरा बहाल हो गया | वो पोछा लगाते -लगाते दीवार पे टेक लगा के बैठ गईं | मेरा पति शराब पी के मुझे मारता था बाद मे निकाल दिया घर से । "और बच्चे ?"
मेरी सोच मे यह सबसे दुखदाई प्रश्न था जो ज़रा धीरे से किया | "था ना एक ,वो उसने ले लिया यहीं रहता मेरे घर से एक गली आगे |"
इतनी सरलता से उन्होंने उत्तर दिया कि मैंने पास खेलते अपने बेटे हमदान को झट अपने से पास कर लिया|ओह! इतना दुखी हृदय उसके आसानी से बोलने पर मेरा मन कारण जानने को भी लालायित हो गया "मैंने आपको दुखी कर दिया ना ?
ना ना वो तो अब बड़ा भी हो गया सादी हो गई उसकी बरस पीछे |"
मन ही मन मैंने सोचा अब तो वो भी बिगड़ गया होगा देने को पिता के पास संस्कार ही कहाँ हैं ? वो फिर से मुस्कुराके काम करके चली गई ।
नतीजा ये निकाला मैंने कि दुखी तो ये हैं मगर मैं नई हूँ इसलिए मुझसे असहज हैं |
गुजरते सुबह शाम से एक साल और दो साल पंख लगा के उड़ गए |समय का तो यही नियम है |रहीम दास जी के अनुसार -
समय लाभ सम लाभ नहीं , समय चूक नहि चूक |
चतुरन चित रहिमन लगी , समय चूक की हूक |
इन बीते दिनो मे कई इंकेशाफ हुए मुझपे | मैंने उन्हे काफी जाना , बिना बोले ही उसके दर्द को पहचाना|
एक बात से मैं अकसर खीझती वो ज़रा भी अच्छा काम नहिं करती |पर इंसान बहुत अच्छी थी। उनके खराब काम करने की जब भी शिकायत उनसे करती वो उल्टा मुझे ही जवाब देतीं ,"ये देखो तुम कितना कचरा करती हो ?" मैं अपना सिर पीट के रह जाती |पर उसका नियम से काम पे आना , त्योहार पे भी आना, हमेशा मेरी मदद करना भला था|लेकिन ईद के दिन भी उसे काम पे आया देख मुझे खल गया |मैं सदैव maid को ईद पे छुट्टी देती रही हूँ|वो बोली , "मुझे
जाना ही कहां है किस्से मिलना सो काम पे आ गई "|
वो बहुत हमदर्द ,मेरा खयाल रखने वाली थीं |बातों मे कभी उन्हें बताया कि यहाँ बनने वाली dish अखनी मुझे पसंद है तो ना जाने कहाँ हुए मिलाद - नियाज़ पे से मेरे लिए ढेर सारी अखनी ले आई |क्या क्या बताऊँ ....हाँ खुद गरीब होने पे भी कभी उसने एक पैसा उधार नहीं मांगा बल्कि अपनी तनख़ाह का अधिक पैसा अपनी अपाहिज बहन और उसके बच्चों पे खर्च करतीं |अपने ही भाई के घर के ऊपर के पोर्शन मे किराया देके रहतीं|
अंत ये है की मैं जो अक्सर परदेस मे अकेलेपन का रोना रोती रहती उसे देख के कुछ सुधर गई, रात मे अक्सर नींद ना आने की मैं शिकार उनके बारे मे सोचने पे विवश हो जाती कैसे रहती होगी ये अकेले इसे ऊपरवाले की नाइंसाफी कहूँ या मर्ज़ी |
यकीन जानिए रब के फैसले हमारी ख़्वाहिशों से बेहतर हैं|
इसी बात से दिल को तसल्ली दे लेती हूँ की जिसने भी इन का नाम रक्खा वो वो धन्य है|सच ही नाम है महफ़ूजा ,क्योंकि महफूज़ है ये हर ग़म से या फिर अनपढ़ होके भी जीवन जीने का हुनर इन्हें आता है|
ग़म खुद ही खुशी मे बादल जाएंगे ।
सिर्फ मुस्कुराने की आदत होनी चाहिए |
बहुत ही अच्छी दोस्ती है आप की हिन्दी से, खास कर दोहे जो लिखती है वो कमाल के है हर कोई नहीं लिख सकता ।
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